Tuesday, August 17, 2021

अफगान आतंक की नई चुनौती

ब्रह्मदीप अलूने

अफगानिस्तान में आतंकवाद फलने-फूलने के बाद यहां की जमीन चीन ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया से लेकर रूस तक को आशंकित करती रही है। इसका बड़ा कारण पाकिस्तान के वे आतंकी केंद्र भी हैं जहां तालिबान सहित कई आतंकी संगठन प्रशिक्षण हासिल करते रहे हैं।

यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया को जमीन से जोड़ने वाला अफगानिस्तान अपने भौगोलिक दर्रों की वजह से इतिहास में हमेशा दर्ज होता रहा है। लेकिन अब ये दर्रे दक्षिण एशिया सहित पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए अभिशाप न बन जाएं, इसे लेकर आशंकाएं गहराती जा रही हैं। नब्बे के दशक में तालिबान के उभार के बाद ये दर्रे आतंकियों की पनाहगाह बनते चले गए, जिसके दुर्गम रास्तों से होते हुए प्रशिक्षित आतंकियों ने कई देशों में कोहराम मचाया। दो दशक की खामोशी के बाद तालिबान अब फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया है और इससे आतंकी हिंसा की आशंकाएं फिर से गहरा गई हैं।

अफगानिस्तान में रहने वाले विभिन्न जातीय समूहों की विविधता और भौगोलिक परिस्थितियां आतंक को बढ़ावा देने के लिए मुफीद हैं। अधिकांश आबादी पठान है। इसके बाद पच्चीस से तीस फीसदी ताजिक, करीब दस फीसदी उज्बेक, पांच फीसदी हजारा और दस से पंद्रह फीसदी अन्य जातीय समूह हैं। अफगानिस्तान की कबायली संस्कृति मध्य एशिया में बसने वाले कई नृजातीय समूहों को भी पसंद आती है। पश्तून, उज्बेक, ताजिक और हजारा जैसे कबीलों का सांस्कृतिक समन्वय पामीर के पठार से चीन के शिंजियांग प्रांत तक नजर आता है और यही बात साम्यवादी चीन के लिए मुश्किल पैदा करती रही है।

तालिबान के प्रति चीन की गर्मजोशी का प्रमुख कारण चीन की अपनी सुरक्षा चिंताएं हैं। पिछले महीने जब तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल चीन पहुंचा तो चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इस प्रतिनिधिमंडल से साफ कहा है कि उसे ‘चीन विरोधी’ आतंकवादी संगठन ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से संबंध तोड़ने होंगे। वास्तव में चीन तालिबान के उभार को अपने उत्तर पश्चिम के अशांत क्षेत्र शिंजियांग प्रांत के लिए खतरनाक मानता है। यहां रहने वाले उइगर मुसलमान चीन के खिलाफ पृथकतावादी आंदोलन चला रहे हैं। ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ का मकसद चीन से अलग होना है।

यह पृथकतावादी आंदोलन 1949 की स्थिति बहाल करना चाहता है और स्वतंत्र पूर्वी तुर्किस्तान को ही स्वीकार करता है। पूर्वी तुर्किस्तान ही चीन प्रशासित शिंजियांग है। इसकी सरहदें दक्षिण में तिब्बत और भारत, पूर्व में मंगोलिया, उत्तर में रूस और पश्चिम में कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से मिलती हैं। चीन का सबसे बड़ा संकट शिंजियांग की पश्चिमी सीमा है जो मुसलिम देशों से मिलती है और यही कारण है कि चीन अफगानिस्तान में सैन्य अड्डा भी बनाना चाहता है।

पिछले कुछ समय से अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट (आइएस) के उभार से चीन के अशांत शिंजियांग में आंतरिक अशांति और ज्यादा बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। मध्य एशियाई देशों में सक्रिय आइएस से इस क्षेत्र में सहानुभूति रखने वाले कट्टरपंथी मौजूद हैं। इस क्षेत्र के विभिन्न देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ज्बेकिस्तान और शिंजियांग से कुल मिला कर हजारों लड़ाके आइएस के समर्थन में लड़ने के लिए सीरिया और इराक जा चुके हैं। ऐसे में आइएस ने उत्तरी अफगानिस्तान में अपने पैर जमाने की कोशिशें जारी रखी हैं ताकि वह मध्य एशिया, चेचेन और चीनी वीगर उग्रवादियों से गठजोड़ कर सके। अब तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज होने के बाद कई नाराज जातीय समूह इस्लामिक स्टेट से जुड़ सकते है और यह इस पूरे क्षेत्र के लिए सुरक्षा संकट बढ़ा सकता है।

अफगानिस्तान में आतंकवाद फलने-फूलने के बाद यहां की जमीन चीन ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया से लेकर रूस तक को आशंकित करती रही है। इसका बड़ा कारण पाकिस्तान के वे आतंकी केंद्र भी हैं जहां तालिबान सहित कई आतंकी संगठन प्रशिक्षण हासिल करते रहे हैं। मध्यपूर्व, कश्मीर, अजरबैजान और आर्मेनिया सहित कई क्षेत्रों में हुए युद्धों और संघर्षों में विरोधी देशों ने अस्थिरता फैलाने के लिए भाड़े के लड़ाकों का उपयोग किया है।

पैसे के लिए दुनिया के किसी भी भाग में जाकर लड़ने के लिए तैयार ये सैनिक अफगानिस्तान, पाकिस्तान, लीबिया, लेबनान, सीरिया, इराक, यमन, सूडान और नाइजीरिया जैसे गरीब और गृहयुद्ध से जूझने वाले देशों से होते हैं। इनमें आतंकवादियों को भी शामिल किया जाता है, जिनके प्रशिक्षण अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तान में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट और जमायत-उल-उलूम-इलझ्रइस्लामिया जैसे संस्थान बहुत कुख्यात हैं। मुजफ्फराबाद, अलियाबाद, कहूटा, हजीरा, मीरपुर, रावलकोट, रावलपिंडी और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र हैं। इस संस्थानों का काम इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देना है। यहां पर सिंकियांग के उइगुर सहितत उजबेक और तुर्क भी प्रशिक्षण लेते रहे हैं। चेचेन्या में रुसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी और मुल्ला उमर समेत तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले हैं।

तालिबान के सत्ता में आने से म्यांमा भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। म्यांमा में बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों के संघर्ष के बीच जिहादी संगठन एकजुट होकर म्यांमा को सबक सिखाने की घोषणा कर चुके हैं। इसमें यमन का अलकायदा समूह और पाकिस्तान के लश्कर-एझ्रतैयबा शामिल हैं। रोहिंग्या सुन्नी इस्लाम को मानते हैं। 1991-92 में म्यांमा में सेना के दमन के कारण करीब ढाई लाख रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए थे। उस दौरान पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों की सीमा से घुस कर तकरीबन चालीस हजार रोहिंग्या भारत के विभिन्न स्थलों में बस गए। अब तालिबान के मजबूत होने से भारत के बौद्ध धर्म स्थलों को निशाना बनाया जा सकता है।

यहीं नहीं, बांग्लादेश के चरमपंथी संगठन हूजी के भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के कई कट्टरपंथी संगठनों से गहरे संबंध हैं और वे आइएसआइ के इशारे पर काम करते है। अस्सी के दशक में जब सोवियत-अफगान युद्ध जब चल रहा था, उसी को ध्यान में रखते हुए बांग्लादेश की कट्टरपंथी ताकतों ने कुख्यात आतंकी संगठन हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लाम की स्थापना की थी। इस युद्ध में बांग्लादेशी मुजाहिदीनों ने भी हिस्सा लिया था। अब यह आतंकी संगठन संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित है। हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लाम पश्चिमी म्यांमा में रोहिंग्या विद्रोह का समर्थन करने के लिए जाना जाता है।

भारत के एक और पड़ोसी श्रीलंका में भी आतंकी हमलों के तार अफगानिस्तान से जुड़ने की पुष्टि हुई है। 2019 में ईस्टर पर हुए आत्मघाती हमले के बाद श्रीलंका सरकार ने स्थानीय जिहादी समूह नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) और दो अन्य संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि एनटीजे देश के कुछ बौद्ध स्मारकों को उड़ाने की योजना बना रहा था। जांच एजेंसियों के अनुसार 2016 में केरल के कुछ कट्टरपंथी लोगों का एक समूह श्रीलंका के नेगोम्बो गया था। नेगोम्बो सहित श्रीलंका के कई शहरों में 2019 में ईस्टर के मौके पर धमाके हुए थे, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए थे। माना जाता है कि ये लोग बाद में अफगानिस्तान जाकर आइएस में शामिल हो गए थे। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रशिक्षित कट्टरपंथी विचारधारा से मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों के उदार या धर्मनिरपेक्ष लोग दहशत में हैं।

जाहिर है, तालिबान के प्रभाव में दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में काम करने वाले कई आतंकी संगठन हैं। अफगानिस्तान एक बार फिर दुनिया के आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप समेत दुनिया को नीतिगत कदम तुरंत उठाने होंगे। इसमें पाकिस्तान को नियंत्रित किया जाना बेहद जरूरी है।

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From: Jansatta

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