Sunday, August 22, 2021

खुला पाठ

विनोद शाही

रचना और आलोचना का संबंध और विकास साहित्य की एक ऐसी विकासयात्रा है, जिसमें समय और सरोकार का हस्तक्षेप उत्तरोतर बढ़ता गया है। इससे एक तरफ किसी कृति को देखने-समझने की दृष्टि व्यापक हुई है, वहीं नए मूल्यों को भी अहमियत हासिल हुई है। आलोचना की नई समझ और नए सरोकारों के बीच खुले पाठ के तर्क के साथ आज आलोचना की पुरानी परंपरा नया आकार ले रही है।

अंबर्तो ईको के विवेचन क्या सामने आए, आलोचना में ‘खुले पाठ’ की बात होनी शुरू हो गई। ‘खुला पाठ’ यानी ‘ओपन टेक्स्ट’। इसे कृतियों के ‘बंद पाठ’ (क्लोज्ड टेक्स्ट) के उलट कृतियों की नए किस्म की पाठ विधि के रूप में ग्रहण किया जाता है। परंपरागत आलोचना कृतियों के तयशुदा अर्थ का बोध कराती है। पर जो कृतियां परंपरागत विधाओं के तयशुदा ढांचे को किसी न किसी अर्थ में तोड़ती हैं उनको ‘खुले पाठ वाली कृतियां’ कहते हैं। इस तरह ‘खुला पाठ’ एक ओर कृतियों के विधागत विवेचन के काम आता है, तो दूसरी ओर उनकी खुली व्याख्या के।

समग्रता का तर्क

रूपवाद और नई आलोचना में यही काम कृतियों को उनके भाषापाठ तक सीमित मान कर किया जाता था। पर फ्रैंकफर्ट स्कूल से जुड़े डेल्यूज तथा उनके सहयोगी ग्वेतारी जैसे चिंतकों ने अनुभव किया कि साहित्यिक कृतियों के पाठ विविध कारकों व संदर्भों से जुड़कर खुद को भिन्न अर्थ में दोहराते हैं। इस तरह एक ही पाठ अनेक पाठों का समूह हो सकता है।

ऐसे में यह विचार सामने आया कि कृतियों को लेखक के जीवन, उसके तथा कृति के पात्रों व स्थितियों के परिवेश, इतिहास, राजनीतिक परिदृश्य, लैंगिक व जातीय मनोविज्ञान आदि से जुड़े ‘विविध पाठों’ के आपसी रिश्तों को समझ कर एक ‘समग्र पाठ’ की तरह पढ़ा जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि कृति का ऐसा ‘खुला पाठ’ उसके परंपरागत पाठ के बजाये जीवन व समाज के पाठ की तरह खुल सकता है।

अंतर्पाठ और बहुपाठ

इस दिशा में आगे बढ़ते हुए जिन पश्चिमी चिंतकों ने इस पाठ प्रविधि को विकसित करने में मुख्य भूमिका निभाई है, वे हैं- अंबर्तो ईको, मिखाइल बाख्तिन, जूलिया क्रिस्तेवा, रोलां बार्थ और जाईल्स डिल्यूज। कृतियों के संबंध में विचार करते हुए लेखक के जीवन, कृतियों के अन्य कृतियों से संबंध तथा परिवेश से जुड़ी बातों को आधार बनाकर, सबको एक साथ एक इकाई के हिस्से की तरह देखते हुए जब हम साहित्य का अध्ययन करते हैं तो उसे अंतर्पाठ और बहुपाठ समर्थित ‘खुला पाठ’ कहते हैं।

हमारे समय में सूचना क्रांति का जो विस्फोट हुआ है, उसके कारण अंतर्पाठीय आलोचना (इंटरटेक्सचुअल क्रिटिसिज्म) की ओर रुख करने की जरूरत पड़ रही है। साहित्य के अपने समय में विकास की जो जटिल प्रक्रियाएं हैं, उन्हें न समझने के लिए परंपरावादी आलोचक अगर बहाने खोजते हैं तो वे सिवाय अपने वक्तसे पिछड़ जाने के अन्य किसी गंभीर विमर्श का परिचय नहीं देते।
अभिव्यक्ति के नए रूप

जहां तक कृति का प्रश्न है तो वह अनेक प्रकार से लिखी जा सकती है। उसे कोई चाहे तो एक मिश्र विधा की शक्ल भी दे सकता है। और कोई चाहे तो और अधिक ‘खुले पाठ’ के रूप में दूसरे भाषा पाठों से रिश्ता बनाते हुए अभिव्यक्तिके नए रूपों के लिए रास्ता बना सकता है। साहित्य अब ‘खुले पाठ’ की संभावनाओं को टटोलता हुआ अंतर्पाठीय और बहुपाठीय होते-होते आखिरकार कृतियों के ‘समेकित पाठ’ की दिशा में आगे विकास कर रहा है।
भाषा का मेला

स्त्री पाठ और मानव वैज्ञानिक जातीय पाठ की बात भाषा के बहुस्तरीय होने की बात में बदलती जा रही है। पाठ की गहरी संरचना में बेशुमार पाठ संभव हो रहे हैं। रूस से अमेरिका चले आए एक बड़े भाषाशास्त्र आलोचक बाख्तिन का तो यहां तक कहना है कि साहित्य के पाठ भाषा के ‘कार्निवल’ की तरह हो रहे हैं। यानी एक मेले की तरह। साहित्य बेशुमार जुबानों में बोलने लगा है और वह भी एक साथ। इसे बाख्तिन ने ‘पोलीफोनी’ कहा है। पर हिंदी साहित्य में बड़े-बड़े विद्वान भी कृतियों को अभी तक परंपरागत विधाओं और उनके लिए तयशुदा पाठ पद्धतियों के दायरे के भीतर से ही उन्हें देखने- समझने के लिए जहां थे, वहां रुके रहना चाहते हैं। नए विचारों को वे अराजक मानते हैं।
दौर और शास्त्र
दरअसल, कुछ कृतियां खुले पाठ के लिए आमंत्रण देती हैं। इन्हें परंपरागत विधाओं की तरह न लिखकर अलग तरह से लिखा गया होता है। साहित्य में जब विधाओं के रूप बदलते हैं, तो पाठ की पद्धतियों का बदलना भी जरूरी हो जाता है। परंपरागत काव्यशास्त्र काव्य और नाटक केंद्रित था। आधुनिक काल का साहित्य चिंतन कथा और निबंध की ओर अधिक रुख कर रहा है।ये चार बुनियादी विधाएं हैं। उत्तरा अधुनिक दौर मिश्र विधाओं की ओर खुला है। पश्चिम में स्थापत्य के मिश्र रूपों से जुड़ा एक शब्द ‘पेस्टीश’ साहित्य में भी चला आया है। पर अब और अधिक जटिल संरचनाएं सामने आ रही हैं। जैसे ऊपर बाख्तिन के ‘कार्निवल’ की बात की गई, वैसे ही कुछ लोग साहित्य की कृतियों को विविध पाठों और अर्थों के ‘डेटाबेस’ की तरह देखने की बात कर रहे हैं।

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From: Jansatta

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