Monday, August 30, 2021

आर्थिक संकटों के बीच उम्मीदें

जयंतीलाल भंडारी

महामारी के कारण देश के जो करोड़ों लोग गरीबी और बेरोजगारी के बीच पहले ही से संकट में थे, उनके अब बेहद गरीबी में जाने का खतरा खड़ा हो गया है। इसका अनुमान संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की रिपोर्ट से भी लगाया जा सकता है जिसमें कहा गया है कि महामारी के दीर्घकालिक परिणामों के तहत दुनिया में 2030 तक भारत सहित गरीब और मध्यम आय वर्ग वाले देशों के करीब इक्कीस करोड़ लोग घोर गरीबी में जा सकते हैं।

देश की अर्थव्यवस्था दूसरी लहर की मार से अभी उबर भी नहीं पाई है कि तीसरी लहर का खतरा सामने खड़ा है। यह खतरा पटरी पर आती अर्थव्यवस्था के लिए फिर से चुनौती साबित हो रहा है। अभी भी उद्योग-कारोबार की मुश्किलों के साथ-साथ गरीबी, रोजगार और आम आदमी की घटती आमदनी संबंधी चिंताएं बता रही हैं कि अर्थव्यवस्था कैसे गंभीर संकट से जूझ रही है। खासतौर से छोटे उद्योग-धंधे और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक वर्ग की गरीबी और रोजगार संबंधी समस्याएं विकराल रूप धारण कर चुकी हैं।अगस्त, 2021 की बाजार रिपोर्टों के मुताबिक मांग की स्थिति अभी भी काफी कमजोर है। साथ ही असमान मानसूनी बारिश ने महंगाई की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।

इस परिदृश्य के बीच देश और दुनिया में भारत में महामारी के कारण गरीबी बढ़ने और रोजगार के अवसरों में कमी आने की रिपोर्टों ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में बताया गया है कि पिछले साल कोविड संकट के पहले दौर में करीब तेईस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जा चुके हैं। यह वह तबका है जो प्रतिदिन राष्ट्रीय न्यूनतम पारिश्रमिक तीन सौ पचहत्तर रुपए से भी कम कमा रहा है। अमेरिकी शोध संगठन प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना महामारी ने भारत में बीते साल साढ़े सात करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल में धकेल दिया।

रिपोर्ट में प्रतिदिन दो डॉलर यानी करीब डेढ़ सौ रुपए कमाने वाले को गरीब की श्रेणी में रखा गया है। अब स्थिति यह है कि महामारी के कारण देश के जो करोड़ों लोग गरीबी और बेरोजगारी के बीच पहले ही से संकट में थे, उनके अब बेहद गरीबी में जाने का खतरा खड़ा हो गया है। इसका अनुमान संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की रिपोर्ट से भी लगाया जा सकता है जिसमें कहा गया है कि महामारी के दीर्घकालिक परिणामों के तहत दुनिया में 2030 तक भारत सहित गरीब और मध्यम आय वर्ग वाले देशों के करीब इक्कीस करोड़ लोग घोर गरीबी में जा सकते हैं।

लेकिन संकट के इस दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चार लाभप्रद आर्थिक अनुकूलताएं उभरती दिखाई दे रही हैं। इनमें पहली है मजबूत कृषि विकास दर, रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन व रिकॉर्ड कृषि निर्यात। दूसरी है रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा विदेशी मुद्रा भंडार। तीसरा जो मजबूत पक्ष दिखाई दे रहा है वह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का रिकॉर्ड प्रवाह है। और चौथी बात यह कि तेजी से बढ़ते शेयर बाजार से उम्मीदें जग रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश को पिछले डेढ़ साल में सबसे ज्यादा संबल कृषि क्षेत्र से ही मिला है।

इसलिए पिछले कुछ समय में सरकार ने भी कृषि क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता में रखा है। सबसे बड़ी बात तो यह कि कृषि क्षेत्र से निर्यात तेजी से बढ़ा है। चालू फसल वर्ष 2020-21 में खाद्यान्न की कुल पैदावार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचते हुए 30.86 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह खाद्यान्न पैदावार पिछले वर्ष की कुल पैदावार 29.75 करोड़ टन के मुकाबले अधिक है। आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 में कहा गया है कि महामारी के दौरान देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बड़ी गिरावट आई और शून्य से काफी नीचे चला गया, लेकिन कृषि की विकास दर में करीब तीन फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई।

यदि हम रबी के मौसम में हो रही फसलों की खरीद को देखें तो पाते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर रिकॉर्ड खरीद हुई है। एक खास बात यह भी कि भारतीय खाद्य निगम के मुताबिक देश में एक अप्रैल, 2021 को सरकारी गोदामों में करीब 7.72 करोड़ टन खाद्यान्न का सुरक्षित भंडार था, जो आवश्यकता से करीब तीन गुना है।

उल्लेखनीय है कि रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 14 अगस्त को देश का विदेशी मुद्रा भंडार 621.464 अरब डॉलर की ऐतिहासिक रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया और भारत विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश बन गया। देश के इस विशाल विदेशी मुद्रा भंडार से जहां भारत की वैश्विक आर्थिक साख बढ़ी है, वहीं इस भंडार से साल भर से भी अधिक की आयात जरूरतों की पूर्ति की जा सकती है। अब देश का विदेशी मुद्रा भंडार देश के अंतरराष्ट्रीय निवेश की स्थिति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

यह भी कम उपलब्धि नहीं है कि महामारी की वैश्विक मुश्किलों के बीच वर्ष 2020 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) का प्रवाह 25.4 फीसद बढ़ कर चौंसठ अरब डालर तक पहुंच गया। वर्ष 2019 में यह इक्यावन अरब डॉलर था। दुनिया में एफडीआइ हासिल करने के मामले भारत 2019 में आठवें स्थान पर था और 2020 में पांचवें स्थान पर आ गया। हालांकि पिछले वित्त वर्ष में दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में बड़ी गिरावट थी, इसके बावजूद विदेशी निवेशकों के द्वारा भारत को एफडीआइ के लिए प्राथमिकता दिए जाने के कई कारण हैं। भारत में निवेश पर बेहतर रिटर्न हैं। भारतीय बाजार बढ़ती मांग वाला बाजार है।

शेयर बाजार में तेजी का रुख भी अर्थव्यवस्था की बेहतरी के संकेत दे रहा है। पिछले वर्ष यानी तेईस मार्च 2020 को जो बीएसई सूचकांक 25981 अंकों के साथ ढलान पर था, वह इस साल 25 अगस्त को 55,944 के उच्च स्तर पर दिखाई दिया। इस वक्त शेयर बाजार में आइपीओ लाने की होड़ मची हुई है। आइपीओ में खुदरा निवेशकों की भागीदारी पच्चीस फीसद बढ़ी है। पिछले वित्त वर्ष में एक करोड़ चालीस लाख से ज्यादा डीमैट खाते खुले हैं। देश में डीमैट खातों की संख्या अब साढ़े छह करोड़ से ऊपर निकल गई है। खासतौर से चालू वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में सरकार ने वृद्धि दर और राजस्व में बढ़ोतरी को लेकर जो एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है, उससे शेयर बाजार को बड़ा प्रोत्साहन मिला है।

चालू वित्त वर्ष के बजट में जिस तरह से निजीकरण को बढ़ावा देने के साथ-साथ बीमा, बैंकिंग, विद्युत और कर सुधारों के रास्ते बढ़ने के लिए जो कदम उठाए हैं, उनसे भी शेयर बाजार को गति मिली है। वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को भी भारी प्रोत्साहन से शेयर बाजार को ताकत मिली है। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की सीमा बढ़ा कर चौहत्तर प्रतिशत करने से इस क्षेत्र को नई पूंजी प्राप्त करने और कारोबार बढ़ाने में मदद मिलेगी। वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में लाभांश पर भी स्पष्टता रणनीति सुनिश्चित की गई है। इन सबसे शेयर बाजार में पारदर्शिता बढ़ी है और निवेशक बाजार में पैसा लगाने के लिए आकर्षित हो रहे हैं।

इस वक्त जिस तरह की आर्थिक और औद्योगिक चुनौतियां सामने हैं, उनमें चालू वित्त वर्ष में विकास दर को बढ़ाने के और अधिक रणनीतिक प्रयास जरूरी हैं। इस बात पर भी ध्यान दिया जाना होगा कि इस समय टीकाकरण लक्ष्य के अनुरूप ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। देश में लोगों की खर्च संबंधी धारणा को बेहतर बनाया जाए। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जरूरी है कि इसके विशाल उपभोक्ता बाजार में बुनियादी जरूरतों के लिए अधिक खर्च करने की चाहत पैदा की जाए। सरकार द्वारा नई मांग के निर्माण हेतु लोगों की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से कदम आगे बढ़ा जाए। उद्योग-कारोबार को गतिशील करने के लिए जीएसटी लागू होने के चार वर्ष बाद भी जीएसटी संबंधी जो बाधाएं आ रही है, उन्हें दूर किया जाए। तभी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ सकेगी।

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From: Jansatta

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