आजकल कुछ देशों की नागरिकता पैसे के बदले बिकने लगी है। अपना चोला बदलते देर ही कितनी लगती है। बस गंगा गए तो गंगाराम और जमना गए तो जमना दास हो जाते हैं। पीछे जिन्हें छोड़ गए, वे प्रासाद के प्राचीर उनकी प्रतीक्षा करते हैं। वे जिन बैंकों के कोषागार खाली कर गए थे, उनके वजूद लड़खड़ाने लगते हैं। दूर बैठे उनकी चिंता की जा सकती है। चिंता करने में जाता क्या है?
From: Jansatta
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Friday, July 2, 2021
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