जब रेणु के रचना-संसार में आंचलिकता के प्रभाव से पात्रों को ही नहीं, पूरे परिवेश को धड़कते पाया और अपने क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित कवयित्री की सरस, सजीव और भाव-प्रवण भाषा में स्थानीय बोली से जुड़े अनुभवों की केंद्रीय भूमिका को पहचाना तो लगा कि अगर मेरा बचपन बोलियों से हरा-भरा होता तो मेरी हिंदी का बाग विविधवर्णी स्थानीय अभिव्यक्तियों के फूलों से सदाबहार होता।
From: Jansatta
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Tuesday, June 15, 2021
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